द देवरिया न्यूज़ : उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनाव (2026) और 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का सक्रिय साथ मिलने जा रहा है। इसके अलावा राज्य की विधान परिषद की 11 सीटों पर होने वाले चुनावों को लेकर भी भाजपा और संघ मिलकर रणनीति तैयार करेंगे।
इस कड़ी में दोनों संगठनों के बीच महत्वपूर्ण समन्वय बैठक रविवार को राजधानी लखनऊ के निरालानगर स्थित संघ कार्यालय में होने जा रही है। बैठक में आगामी चुनावों की साझा रणनीति के साथ-साथ विपक्ष के राजनीतिक हमलों का समन्वित जवाब देने पर मंथन होगा। हालांकि चुनावी मैदान में सामने सिर्फ भाजपा ही नजर आएगी, जबकि रणनीति और जमीनी काम में संघ परिवार सहयोग करेगा।
जोधपुर बैठक के बाद यूपी में भी तेज हुआ समन्वय
हाल ही में जोधपुर में संघ की तीन दिवसीय राष्ट्रीय समन्वय बैठक हुई थी, जिसमें भाजपा और संघ के रिश्तों को और प्रगाढ़ करने पर ज़ोर दिया गया। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश में भी अब एक विस्तृत रणनीति बनाने की तैयारी है। रविवार की बैठक इसी दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
एबीवीपी विवाद भी रहेगा चर्चा में
बैठक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े कार्यकर्ताओं और एक निजी विश्वविद्यालय को लेकर हाल ही में हुए विवाद पर भी चर्चा हो सकती है। भाजपा सरकार के दौरान पुलिस द्वारा एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज को लेकर संघ में नाराजगी देखी गई थी। माना जा रहा है कि बैठक में फ्रंटल संगठनों की नाराजगी को दूर करने की कोशिशें भी की जाएंगी।
32 आनुषांगिक संगठनों के पदाधिकारी होंगे शामिल
संघ की बैठक में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी, प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह और सभी क्षेत्रीय अध्यक्ष मौजूद रहेंगे। साथ ही संघ से जुड़े करीब 32 आनुषांगिक संगठनों के पदाधिकारी भी इस बैठक का हिस्सा बनेंगे।
सपा के पीडीए फॉर्मूले को भाजपा के लिए चुनौती
भाजपा के सामने फिलहाल दो बड़ी चुनावी चुनौतियां हैं — पंचायत चुनावों में बढ़त हासिल करना और समाजवादी पार्टी (सपा) के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का प्रभाव कम करना। इन दोनों ही लक्ष्यों को साधने के लिए संघ और भाजपा एक बार फिर संगठित रूप से मैदान में उतरने की तैयारी में हैं।
लोकसभा चुनाव में ‘संघ की दूरी’ से भाजपा को नुकसान
सूत्रों का मानना है कि लोकसभा चुनाव 2024 में संघ की अपेक्षाकृत कम सक्रियता से भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में अब पार्टी एक बार फिर संघ के साथ समन्वय मजबूत करके आगामी चुनावों में अपनी स्थिति को बेहतर करना चाहती है। वहीं संघ को भी यह एहसास है कि भाजपा की कमजोरी कहीं न कहीं उसके सांगठनिक विस्तार और प्रभाव को भी प्रभावित कर सकती है।
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