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मौनी अमावस्या पर प्रयागराज बना सनातन अनुशासन की मिसाल, हर घंटे बनते रहे श्रद्धालुओं के नए रिकॉर्ड

Published on: January 19, 2026
Prayagraj on Mauni Amavasya
द देवरिया न्यूज़,प्रयागराज। मौनी अमावस्या पर तीर्थराज प्रयाग ने सनातन संस्कृति की ऐसी जीवंत तस्वीर पेश की, जिसने आस्था, अनुशासन और सामूहिक चेतना का अद्भुत उदाहरण दुनिया के सामने रख दिया। शनिवार–रविवार की दरमियानी रात से ही संगम नगरी में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर मौन धारण कर स्नान करने वाले श्रद्धालुओं का ऐसा रेला उमड़ा कि हर घंटे नए रिकॉर्ड बनते चले गए। एक ही दिन में करीब 4.52 करोड़ श्रद्धालुओं ने पुण्य की डुबकी लगाई।
इस विशाल जनसमूह में आसपास के गांवों से सिर पर गठरी रखकर आए लोग भी थे और विशेष ट्रेनों व बसों से पहुंचे देशभर के श्रद्धालु भी। हैरानी की बात यह रही कि इस बार आस्था के इस सागर में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या भी बड़ी तादाद में नजर आई। श्रद्धा के इस महासंगम की सबसे बड़ी खासियत रहा अनुशासन—न तेज आवाज में भजन-गाने, न तोड़फोड़, न बैरियर पर हंगामा। बस एक ही तड़प थी, बिना बोले और बिना किसी व्यवधान के त्रिवेणी में स्नान करने की।
यह दृश्य उन बाबाओं के लिए भी एक मौन संदेश था, जो वीआईपी संस्कृति अपनाकर सुर्खियां बटोरने में लगे रहते हैं। यहां श्रद्धालु प्रशासन की बनाई व्यवस्था के अनुसार शांतिपूर्वक चलते रहे। मन में केवल मां गंगा और आंखों में सिर्फ पवित्र त्रिवेणी का दर्शन था। इस मौन स्नान में हर किसी ने उस बदलाव की अनुभूति की, जो सनातन संस्कृति के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
इसी का उदाहरण तब भी दिखा, जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के रथ को लेकर विवाद की स्थिति बनी। उस समय भी हजारों श्रद्धालु स्नान के बाद चुपचाप लौटते रहे, उन्हें किसी हंगामे या मीडिया तमाशे में कोई रुचि नहीं थी।
स्टेशन से संगम और अन्य घाटों तक, स्नान के बाद भंडारे में प्रसाद ग्रहण करने से लेकर घर वापसी तक, श्रद्धालु पंक्तिबद्ध नजर आए। मानो सभी ने तय कर लिया हो कि अपने आचरण और व्यवहार से सनातन संस्कृति की गरिमा बढ़ाकर ही लौटना है। रास्ता भटके तो युवा भक्त स्वयं आगे बढ़कर मार्गदर्शन करते दिखे।
किन्नर सनातनी अखाड़े की महामंडलेश्वर भी तय संख्या में संतों के साथ पैदल, बिना किसी तामझाम और प्रचार के स्नान कर लौट गईं। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं, हर चेहरा संतोष और शांति से भरा था।
सचमुच, मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज ने सनातन संस्कृति की वह तस्वीर दिखाई, जिसके विस्तार की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि हर पर्व पर ऐसी ही प्रशासनिक तैयारी और श्रद्धालुओं में ऐसा ही संयम रहे, तो तीर्थराज प्रयाग का यह संदेश सदियों तक पूरे संसार को प्रेरित करता रहेगा।

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