द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : वैश्विक टैरिफ संकट और पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत और अरब देशों के रिश्तों को नई मजबूती देने की दिशा में एक बड़ी पहल होने जा रही है। भारत और अरब देशों के विदेश मंत्रियों की दूसरी अहम बैठक शनिवार को आयोजित होगी। इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) करेंगे।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस बैठक में अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्री और अरब लीग के महासचिव भी शामिल होंगे। खास बात यह है कि यह बैठक करीब दस साल के लंबे अंतराल के बाद हो रही है। इससे पहले भारत–अरब विदेश मंत्रियों की पहली बैठक वर्ष 2016 में बहरीन में आयोजित हुई थी।
दस साल बाद फिर सक्रिय होगा भारत–अरब सहयोग मंच
पहली बैठक में भारत और अरब देशों ने आपसी सहयोग के पांच प्रमुख क्षेत्रों—अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति—की पहचान की थी। इन क्षेत्रों में संयुक्त गतिविधियों और दीर्घकालिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के प्रस्ताव भी रखे गए थे। अब दूसरी बैठक से उम्मीद की जा रही है कि इन सहयोग क्षेत्रों को और विस्तार दिया जाएगा और नई रणनीतिक दिशा तय की जाएगी।
विदेश मंत्रालय का कहना है कि यह बैठक भारत और अरब दुनिया के बीच साझेदारी को आगे बढ़ाने का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत मंच है। भारत–अरब सहयोग की औपचारिक शुरुआत मार्च 2002 में हुई थी, जब भारत और लीग ऑफ अरब स्टेट्स (LAS) के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद दिसंबर 2008 में तत्कालीन अरब लीग महासचिव अमरे मौसा की भारत यात्रा के दौरान अरब–भारत सहयोग मंच की स्थापना की गई थी। वर्ष 2013 में इसके संगठनात्मक ढांचे को और सुव्यवस्थित किया गया।
क्यों अहम है यह बैठक
सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में लगभग 15 अरब देशों के विदेश मंत्रियों के शामिल होने की संभावना है। इनमें सीरिया के विदेश मंत्री असाद हसन अल-शायबानी का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। यदि वे बैठक में आते हैं, तो यह नई दिल्ली और दमिश्क के बीच नई सरकार के गठन के बाद पहली मंत्री-स्तरीय बातचीत होगी, जो कूटनीतिक दृष्टि से काफी अहम मानी जा रही है।
यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब यमन संकट को लेकर सऊदी अरब और UAE के बीच मतभेद सामने आए हैं। साथ ही, हाल के महीनों में सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्किये के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं, जबकि UAE ने इज़राइल के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई दी है।
ऐसे जटिल क्षेत्रीय और वैश्विक हालात में भारत–अरब विदेश मंत्रियों की यह बैठक न केवल द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग को नई दिशा दे सकती है, बल्कि पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक भूमिका को भी और मजबूत कर सकती है।
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