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12 साल से बिस्तर पर पड़े बेटे के लिए पिता ने मांगी इच्छामृत्यु, सुप्रीम कोर्ट ने दी अनुमति

Published on: March 13, 2026
Son lying in bed for 12 years
द  देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली/गाजियाबाद। एक बेहद भावुक और मानवीय मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी है। यह फैसला उस याचिका पर आया, जिसे युवक के पिता अशोक राणा ने दायर किया था। उनका बेटा पिछले 12 वर्षों से बिस्तर पर पड़ा था और वेजिटेटिव अवस्था में जिंदगी जी रहा था।
मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने की। अदालत ने एम्स की मेडिकल टीम की रिपोर्ट पर गौर करते हुए कहा कि युवक की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया था कि हरीश राणा न तो बोल सकता है, न उठ सकता है और न ही अपने किसी भी काम को स्वयं करने की स्थिति में है। डॉक्टरों के अनुसार उसकी सांसें केवल देखभाल के सहारे चल रही थीं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारी मन से एम्स को युवक को सम्मानजनक अंतिम विदाई देने की अनुमति दे दी। कोर्ट ने इस दौरान कहा कि किसी से सच्चा प्यार करने का मतलब है कि सबसे कठिन समय में भी उसकी देखभाल की जाए। अदालत ने यह भी माना कि हरीश के माता-पिता ने वर्षों तक उसकी पूरी निष्ठा से देखभाल की है।
हरीश राणा का जीवन एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गया था। वह चंडीगढ़ के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था और अपने परिवार का सपना था कि वह इंजीनियर बने। लेकिन 20 अगस्त 2013 को पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उस हादसे के बाद से वह कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट सका और पिछले 12 साल से बिस्तर पर ही था।
हरीश के पिता अशोक राणा छोटे स्तर पर सैंडविच बेचकर परिवार का गुजारा करते हैं। उन्होंने बेटे के इलाज और देखभाल में अपनी पूरी ताकत लगा दी, लेकिन जब डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि सुधार की कोई उम्मीद नहीं है, तब उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट के फैसले के बाद अशोक राणा की आंखें नम हो गईं। उन्होंने कहा कि कोई भी मां-बाप अपने बच्चे के लिए मौत नहीं मांगता, लेकिन अपने बेटे को हर पल दर्द में तड़पते देखना उनसे सहन नहीं हो रहा था। मां निर्मला देवी ने भी भावुक होकर कहा कि बेटे को खोने का दर्द जीवन भर रहेगा, लेकिन अब वह पीड़ा से मुक्त हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पैसिव यूथेनेशिया से जुड़े मामलों में यह एक अहम मिसाल बन सकता है। अदालत ने भविष्य में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और नियम बनाने की भी जरूरत बताई है।

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