द देवरिया न्यूज़,काठमांडू। नेपाल में हाल ही में हुए संसदीय चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव संकेत दिया है। पिछले साल सितंबर में हुए Gen-Z आंदोलन के बाद पहली बार हुए इन चुनावों में पारंपरिक राजनीतिक दलों के खिलाफ जनता का गुस्सा साफ नजर आया। युवा नेता और काठमांडू के मेयर रह चुके बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) को बड़ी सफलता मिलती दिख रही है।
रिपोर्ट के अनुसार 90 सीटों में से RSP ने 72 सीटों पर जीत दर्ज की है, जिससे वह संसद की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) दूसरे स्थान पर और नेपाली कांग्रेस तीसरे स्थान पर पहुंचती दिख रही है।
Gen-Z आंदोलन बना बदलाव की वजह
नेपाल में पिछले साल सितंबर में हुए Gen-Z आंदोलन को देश की दूसरी बड़ी जनक्रांति माना जा रहा है। युवाओं ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पारंपरिक राजनीतिक दलों की नीतियों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई थी।
इसी माहौल का फायदा उठाते हुए बालेन शाह ने व्यवस्था में बदलाव और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया। यही कारण रहा कि युवाओं और शहरी मतदाताओं ने उन्हें खुलकर समर्थन दिया।
दिग्गज नेताओं को मिली हार
इस चुनाव में बालेन शाह ने अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और चार बार प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली को करीब 50 हजार वोटों से हराया। इससे यह साफ संकेत मिला कि नेपाल की जनता अब पारंपरिक नेताओं से अलग नई राजनीतिक सोच की ओर बढ़ रही है।
सोशल मीडिया का भी चुनाव में बड़ा असर देखने को मिला। फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय युवाओं ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया। इससे पहले ओली सरकार ने कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया था, जिसके विरोध में युवाओं ने आंदोलन भी किया था।
पुरानी राजनीति से बढ़ी नाराजगी
नेपाल में 2006 की जनक्रांति के बाद से जनता को लोकतंत्र, समानता और विकास की उम्मीद थी, लेकिन लगातार बदलती सरकारों, भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोपों ने लोगों का भरोसा कमजोर किया। 2022 के चुनाव में नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन बाद में सत्ता साझेदारी के कारण पहले प्रचंड और फिर ओली प्रधानमंत्री बने, जिससे जनता के जनादेश पर सवाल उठे।
नई सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां
अब बालेन शाह और उनकी पार्टी के सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी। पार्टी के कई सांसद राजनीति में नए हैं, ऐसे में सरकार चलाने और नौकरशाही के साथ तालमेल बनाना आसान नहीं होगा।
रोजगार, आर्थिक सुधार और विदेशों में काम कर रहे नेपाली नागरिकों की वापसी जैसे मुद्दे भी सरकार के सामने बड़ी चुनौती बन सकते हैं। इसके अलावा पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर विवाद और भ्रष्टाचार के आरोप भी नई सरकार के लिए दबाव पैदा कर सकते हैं।
भारत-चीन संतुलन भी अहम
नई सरकार को विदेश नीति में भी संतुलन बनाए रखना होगा। नेपाल के भारत और चीन दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। सीमा, जल संसाधन और व्यापार जैसे मुद्दों पर भारत के साथ सहयोग बढ़ाना नेपाल की स्थिरता के लिए अहम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव नेपाल में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है। अब देखना होगा कि बालेन शाह की अगुवाई वाली नई राजनीतिक ताकत जनता की उम्मीदों पर कितनी खरी उतर पाती है।
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