राजदूत अलीपोव के मुताबिक, भारत से विभिन्न तरह के सामान और सेवाओं के आयात को बढ़ावा देने की दिशा में काम हो रहा है। इससे कृषि क्षेत्र में बाजार तक बेहतर पहुंच बनेगी और उर्वरक (फर्टिलाइजर) निर्माण के लिए संयुक्त उपक्रम (जॉइंट वेंचर) के नए अवसर खुलेंगे। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के आर्थिक संबंध केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यापार और निवेश के कई नए क्षेत्रों में विस्तार की संभावनाएं मौजूद हैं।
यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका भारत पर रूसी तेल न खरीदने का दबाव बना रहा है। हाल ही में अमेरिका–भारत ट्रेड डील के फ्रेमवर्क के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत के दंडात्मक टैरिफ को खत्म किया था। हालांकि, अमेरिकी एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि भारत रूस से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तेल खरीदता है, तो उस पर दोबारा टैरिफ लगाया जा सकता है।
इससे पहले रूसी राजदूत ने समाचार एजेंसी TASS को बताया था कि पश्चिमी प्रतिबंधों और शिपमेंट में उतार-चढ़ाव के बावजूद रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। उन्होंने कहा कि रूसी हाइड्रोकार्बन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आयात का एक मजबूत आधार हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूसी कंपनियों के कामकाज और आपूर्ति व्यवस्था पर कुछ असर पड़ा है।
अलीपोव ने कहा कि भारतीय खरीदार प्रतिबंधों के जोखिम को कम करने के लिए अपने तरीकों में बदलाव कर रहे हैं। ऐसा पहले भी पश्चिमी प्रतिबंधों के दौर में हुआ है, लेकिन हर बार भारत और रूस ने आपसी फायदे के आधार पर सहयोग जारी रखा है।
गौरतलब है कि रूस दशकों से भारत का सबसे अहम रक्षा साझेदार रहा है। हाल के वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी रूस ने खुद को भारत का भरोसेमंद सहयोगी साबित किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि 1.4 अरब आबादी वाले देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और बदलते वैश्विक हालात के अनुसार ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना भारत की रणनीति का अहम हिस्सा है।