द देवरिया न्यूज़,तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन इस बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि बातचीत विफल होती है तो अमेरिका मिसाइलों से लैस युद्धपोतों का एक और बेड़ा क्षेत्र में भेज सकता है। इस धमकी के बाद खाड़ी क्षेत्र में युद्ध की आशंका गहराती दिख रही है, जिससे सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे पड़ोसी मुस्लिम देशों की चिंता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देशों की चिंता की वजह ईरान के प्रति कोई सहानुभूति नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैलने का खतरा है। अमेरिकी नौसेना और वायुसेना ईरान के चारों ओर मौजूद अपने एयर बेस और हिंद महासागर में तैनात एयरक्राफ्ट कैरियर के जरिए दबाव बनाने में जुटी है। वहीं, ईरान ने भी साफ कर दिया है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के शोधकर्ता डॉ. योएल गुजान्सकी ने इजरायली अखबार ‘वाइनेट’ में प्रकाशित एक लेख में कहा है कि अमेरिका पर खाड़ी देशों और ईरान के पड़ोसी देशों का दबाव है कि वह बातचीत के जरिए समाधान निकाले। उनका कहना है कि खाड़ी देशों को डर है कि यदि सैन्य संघर्ष हुआ तो उनकी सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। पहले यह माना जा रहा था कि खाड़ी के मुस्लिम देश खुलकर ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन करेंगे, लेकिन अब स्थिति इसके उलट नजर आ रही है।
सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों ने सार्वजनिक रूप से ईरान पर हमले का विरोध किया है और खुद को तटस्थ बताया है। ये देश अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे से मध्यस्थता कर रहे हैं ताकि संघर्ष को रोका जा सके। उन्हें आशंका है कि युद्ध की स्थिति में ईरान उनके यहां मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अहम प्रतिष्ठानों को निशाना बना सकता है। 2019 में सऊदी अरब के अरामको तेल संयंत्र पर हुए हमले और 2022 में यमन के हूतियों द्वारा यूएई पर मिसाइल हमले इसकी मिसाल हैं। जून 2025 में कतर में अमेरिकी बेस पर ईरान के सांकेतिक हमले ने भी चिंता बढ़ा दी थी।
खाड़ी देशों को यह भी डर है कि यदि अमेरिकी हमला बेहद सफल रहा और ईरान की इस्लामिक सरकार ढह गई, तो इससे क्षेत्र में स्थिरता नहीं बल्कि अराजकता फैलेगी। आंतरिक संघर्ष, संस्थाओं का पतन, कट्टरपंथी ताकतों का उभार और शरणार्थी संकट जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। इसी वजह से खाड़ी देश चाहते हैं कि किसी समझौते के जरिए ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगे और वे अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी सैन्य कार्रवाई के लिए न होने देने की बात कह रहे हैं।
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