पहली ही फिल्म से बना सुपरस्टार
9 फरवरी 1966 को जन्मे राहुल रॉय को ‘आशिकी’ के लिए महज 30 हजार रुपये फीस मिली थी, जबकि फिल्म की लीड एक्ट्रेस अनु अग्रवाल की फीस उनसे ज्यादा बताई जाती है। फिल्म की कामयाबी इतनी बड़ी थी कि उस दौर में राहुल रॉय की लोकप्रियता शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान जैसे सितारों से भी तुलना में लाई जाने लगी। कहा जाता है कि उस समय ‘आशिकी’ के म्यूजिक एल्बम की रिकॉर्ड तोड़ बिक्री हुई थी।
जल्दबाजी ने डुबोया करियर
‘आशिकी’ के बाद राहुल रॉय का स्टारडम तेजी से बढ़ा, लेकिन यही तेजी उनके लिए नुकसानदायक साबित हुई। बताया जाता है कि उन्होंने जल्दबाजी में महज 11 दिनों के भीतर 47 फिल्मों पर साइन कर लिए। नतीजा यह हुआ कि उनकी ज्यादातर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहीं। ‘गजब तमाशा’, ‘सपने साजन के’, ‘फिर तेरी कहानी याद आई’, ‘गुमराह’, ‘नसीब’, ‘दिलवाले कभी न हारे’ और ‘बारिश’ जैसी फिल्में दर्शकों को लुभाने में नाकाम रहीं।
लोकप्रियता घटी, सवाल उठे अभिनय पर
राहुल रॉय का चॉकलेटी लुक और स्टाइल उन्हें पहचान तो दिला सका, लेकिन दमदार अभिनय की कमी और अकेले फिल्म को हिट कराने की क्षमता पर सवाल उठने लगे। जिस रफ्तार से उनका करियर ऊपर गया था, उतनी ही तेजी से नीचे भी आ गया।
बीमारी ने बदली जिंदगी
फ्लॉप फिल्मों के दौर में राहुल रॉय स्वास्थ्य समस्याओं से भी जूझने लगे और धीरे-धीरे बड़े पर्दे से दूर हो गए। साल 2020 में कारगिल में फिल्म ‘वॉक’ की शूटिंग के दौरान, -12 डिग्री सेल्सियस की कड़ाके की ठंड में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आया। इस स्ट्रोक के बाद उन्हें बोलने और समझने में दिक्कत (Aphasia) होने लगी। पहले श्रीनगर और फिर मुंबई के नानावटी अस्पताल में लंबे समय तक उनका इलाज चला।
संघर्ष के बीच वापसी की कोशिश
लंबे इलाज और रिकवरी के बाद राहुल रॉय ने फिर से काम शुरू किया। उन्होंने कम बजट की फिल्मों में काम किया और शादियों व फंक्शनों में परफॉर्म कर अपनी आजीविका चलाई। बीते साल अक्टूबर में उनकी फिल्म ‘अगर’ रिलीज हुई। वहीं फिल्म ‘वॉक’ को जम्मू-कश्मीर फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड भी मिला, जिसमें राहुल ने कोविड काल की कहानी को पर्दे पर जीवंत किया।
आज भी जारी है जज्बा
कभी हिंदी सिनेमा के दिलों की धड़कन रहे राहुल रॉय का सफर भले ही आसान न रहा हो, लेकिन तमाम उतार-चढ़ाव, बीमारी और संघर्ष के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि शोहरत जितनी तेजी से आती है, उतनी ही जल्दी जा भी सकती है—लेकिन हौसला और जज्बा इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देता है।