द देवरिया न्यूज़,इस्लामाबाद : पाकिस्तान अपने स्वदेशी बताए जा रहे JF-17 लड़ाकू विमान को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़े-बड़े दावे कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की एयरोस्पेस इंडस्ट्री की मौजूदा हालत ऐसी नहीं है कि वह भारी संख्या में लड़ाकू विमानों का उत्पादन कर सके या समय पर विदेशी ऑर्डर की डिलीवरी दे पाए।
JF-17 का निर्माण करने वाला पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स (PAC) कामरा सीमित संसाधनों और कमजोर इकोसिस्टम से जूझ रहा है। इस प्रोजेक्ट में जहां चीन की हिस्सेदारी करीब 65 प्रतिशत है, वहीं पाकिस्तान की भागीदारी केवल 35 प्रतिशत बताई जाती है। इसके बावजूद पाकिस्तान इसे पूरी तरह अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करता रहा है।
17 साल में सिर्फ 180 विमान
पाकिस्तान ने 2000 के दशक में JF-17 का सीरियल प्रोडक्शन शुरू किया था, लेकिन अब तक कुल मिलाकर सिर्फ 175 से 185 विमान ही बनाए जा सके हैं। इसमें घरेलू जरूरतों के साथ-साथ विदेशी ग्राहकों को दी गई आपूर्ति भी शामिल है। यानी औसतन पाकिस्तान साल में लगभग 11 विमान ही बना पाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब विमान के अधिकांश अहम पुर्जे चीन से आते हैं और इंजन रूस का है, तब भी यह उत्पादन दर बेहद कम मानी जाती है।
हालांकि PAC कामरा ने हाल ही में प्रोडक्शन क्षमता को 16–18 विमान प्रति वर्ष तक बढ़ाने की बात कही है, लेकिन रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा ढांचे में यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं है।
विदेशी ऑर्डर पर भी सवाल
पाकिस्तान सऊदी अरब, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, कतर, कजाकिस्तान और सूडान जैसे देशों को JF-17 बेचने के दावे करता रहा है, लेकिन अब तक न तो किसी नई असेंबली लाइन के निर्माण के सबूत सामने आए हैं और न ही सबसिस्टम इंटीग्रेशन या फ्लाइट टेस्ट क्षमता बढ़ाने के संकेत मिले हैं। चीन या पाकिस्तान की मीडिया में भी इन कथित बड़े ऑर्डर्स को लेकर ठोस रिपोर्टिंग नहीं दिखती।
घरेलू जरूरतें भी चुनौती
पाकिस्तान वायुसेना को अपनी रणनीतिक जरूरतों के लिए करीब 25 स्क्वाड्रन विमानों की आवश्यकता है। इसके साथ ही उसे 250 से ज्यादा पुराने विमानों—मिराज III/V और F-7P/PG—को चरणबद्ध तरीके से हटाना है। अगर पाकिस्तान हर साल अधिकतम 18 JF-17 भी बनाता है, तो केवल घरेलू जरूरतें पूरी करने में ही उसे 14 साल से ज्यादा का समय लग सकता है।
विमानों की कमी और दुर्घटनाएं
पिछले एक दशक में पाकिस्तान वायुसेना की ताकत और कमजोर हुई है। इस दौरान कम से कम 35 विमान खोए गए, जिनमें कई दुर्घटनाओं में नष्ट हुए। छह JF-17 क्रैश हो चुके हैं, जबकि भारत के ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में भी पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाना पड़ा, जिसकी पुष्टि जनवरी में हुई। पाक वायुसेना ने कुछ हादसों के लिए रूसी RD-93 इंजन की तकनीकी खामियों को जिम्मेदार ठहराया था।
डिलीवरी टाइमलाइन पर संदेह
जानकारों के मुताबिक, पाकिस्तान को अजरबैजान को 40 JF-17 विमानों की डिलीवरी करने में ही तीन साल से ज्यादा का समय लगने वाला है। ऐसे में सवाल उठता है कि वह एक साथ कई देशों को विमान सप्लाई करने के अपने दावों को कैसे पूरा करेगा। कुल मिलाकर, JF-17 को लेकर पाकिस्तान का प्रचार जितना बड़ा है, उसकी उत्पादन क्षमता और औद्योगिक तैयारी उतनी ही सीमित नजर आ रही है।
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