यह जवाब विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने के समक्ष दाखिल किया गया। अदालत 11 सितंबर, 2025 के उस मजिस्ट्रेटी आदेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें आरोपों की जांच कराने से इनकार कर दिया गया था। जवाब दाखिल होने के बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 फरवरी की तारीख तय की है।
‘आरोप पूरी तरह गलत और बेबुनियाद’
सोनिया गांधी की ओर से वकील तरन्नुम चीमा, कनिष्का सिंह और आकाश सिंह ने अदालत में कहा कि शिकायत ‘‘पूरी तरह से गलत, बेबुनियाद, राजनीति से प्रेरित और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग’’ है। उन्होंने याचिका को खारिज करने का अनुरोध करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट अदालत ने सही रूप से यह माना था कि नागरिकता से जुड़े मामले केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि मतदाता सूची से जुड़े विवाद निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में हैं।
संविधान के अनुच्छेदों का हवाला
जवाब में कहा गया कि आपराधिक अदालतें आईपीसी या बीएनएस की धाराओं की आड़ में निजी शिकायतों के जरिए इन विषयों पर सुनवाई नहीं कर सकतीं। ऐसा करना शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ होगा और संविधान के अनुच्छेद 329 का उल्लंघन होगा, जो चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक लगाता है।
25 साल पुराने विवाद को दोबारा उठाने का आरोप
वकीलों ने कहा कि यह शिकायत किसी बाहरी वजह से और राजनीतिक रूप से प्रेरित होकर दायर की गई है, जिसमें लगभग 25 साल पुराने विवाद को फिर से उठाया गया है। जवाब में यह भी कहा गया कि शिकायत के समर्थन में कोई भी बुनियादी दस्तावेज पेश नहीं किए गए।
इसके साथ ही यह दलील दी गई कि यह मान लेना गलत है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में केवल इसलिए शामिल हुआ क्योंकि उसने फॉर्म-6 जमा किया था। जवाब में कहा गया, “40 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भरोसेमंद सबूत ढूंढना और रिकॉर्ड पर लाना लगभग नामुमकिन है। ऐसे पुराने आरोपों पर विचार करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।”
सितंबर 2025 के आदेश में क्या कहा गया था
सितंबर 2025 में मजिस्ट्रेट अदालत ने शिकायत को खारिज करते हुए कहा था कि यह शिकायत ऐसे आरोपों के आधार पर अदालत को अधिकार क्षेत्र देने की कोशिश है, जो कानूनी तौर पर गलत हैं और इस मंच के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
क्या था आरोप
शिकायतकर्ता और राउज एवेन्यू अदालत की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष वकील विकास त्रिपाठी ने आरोप लगाया था कि जनवरी 1980 में सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में जोड़ा गया था, जबकि उस समय वह भारतीय नागरिक नहीं थीं। उन्होंने जालसाजी और सार्वजनिक प्राधिकरण के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगाया था।
हालांकि, मजिस्ट्रेट अदालत ने जांच के अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि शिकायतकर्ता अदालत को यह मानने के लिए बाध्य करना चाहता है कि मामला उसके अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि ऐसा कानूनी रूप से नहीं है।